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ek pagal si ladaki

मावस  की  काली  रातों  में,  दिल  का  दरवाजा  खुलता  है , जब  दर्द  की काली रातों  में,  गम  आंसूं के  संग घुलता हैं , जब  पिछवाड़े  के  कमरे  में , हम  निपट  अकेले  होते  हैं , जब  घड़ियाँ  टिक -टिक  चलती  हैं , सब  सोते  हैं , हम  रोते  हैं , जब  बार  बार  दोहराने  से  , सारी  यादें  चुक  जाती  हैं , जब  उंच -नीच  समझाने  में , माथे  की  नस  दुःख  जाती  हैं , तब  एक  पगली  लड़की  के  बिन  जीना  गद्दारी लगता  है , और  उस  पगली  लड़की  के  बिन  मरना  भी  भारी  लगता  है . जब  पोथे    खाली  होते  हैं , जब  हर्फ़ सवाली  होते  हैं , जब  ग़ज़लें  रास  नहीं  आतीं , अफसाने  गाली  होते  हैं . जब...

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